Sunday, 18th November, 2018

चलते चलते

"काहे की आजादी? 'चखना' तो आज भी अलग से खरीदना पड़ता है!" -कानपुर के एक युवक का छलका दर्द

14, Aug 2018 By Ritesh Sinha

कानपुर. स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पहले, कानपुर के रहने वाले भग्गू प्रसाद का दर्द उस समय छलक पड़ा, जब वो फ़ेकिंग न्यूज़ को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू दे रहे थे। दरअसल, हम जानना चाहते थे कि ‘आजादी के लगभग सत्तर साल पूरे होने के अवसर पर लोगों की क्या राय है?’ इस मुद्दे पर बोलते हुए भग्गू जी ने गुस्से में कहा कि “काहे की आजादी? इसके नाम पर हमें सिर्फ़ धोख़ा मिला है! आज भी हमें चखना अलग से खरीदना पड़ता है, जबकि इसे दारू के साथ ‘कॉम्बो पैक’ के रूप में आना चाहिए! बताइए? एक आम बेवड़े को सत्तर साल में कुछ हासिल हुआ है क्या? जैसा पहले था, वैसा आज भी है!”

सबसे बड़ी टेंशन!
सबसे बड़ी टेंशन!

भग्गू की इस विचारधारा का उनके ‘ठेका’ दोस्त जग्गू ने भी समर्थन किया है। इस मुद्दे पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि “देखिए भाईसाब! माल खरीदने के लिए तो हम पैसा देते ही हैं, और देना भी चाहिए, इसमें कोई लज्जा की बात नहीं है! हर चीज़ मुफ्त में थोड़ी ना मिल जाएगी, लेकिन ‘चखना’ तो फ्री में दे दो सालों!”

“सच बताऊँ! खरीदते समय जान निकल जाती है! मैं VIP चखना की बात नहीं कर रहा हूँ भाईसाब! साधारण सी मूंगफली का रेट पता है आपको? (कहते हुए वो ख्यालों में डूब गए) हमारे लिए तो असली आजादी उसी दिन आएगी, जब काउंटर पर ‘माल’ के साथ-साथ फ्री में ‘चखना’ भी मिलेगा!” -जग्गूजी ने दोनों हाथ ऊपर उठाते हुए कहा।

कानपुर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ाने वाले तिलोचन बाटलीवाला ने बताया कि “देखिए! यह बहुत पुरानी मांग है जो आज तक पूरी नहीं हुई है! इस मुद्दे पर समाज में खुलकर बहस होनी चाहिए और जितनी जल्दी हो सके सरकार को इस ज्वलंत मुद्दे का हल ढूँढना चाहिए!”

वहीँ कुछ और लोग भी हैं जो ‘आजादी’ के कॉन्सेप्ट से बिल्कुल भी इम्प्रेस नहीं हुए हैं। टेक कंपनी में काम करने वाले साहिल खन्ना का मानना है कि “जब तक ‘कॉफी मशीन’ में आग नहीं लगाईं जाती तब तक ‘आजादी’ का कोई मतलब नहीं है। चाय-कॉफी की जगह ऑफिस में गोलगप्पे मिलने चाहिए!



ऐसी अन्य ख़बरें