Sunday, 18th November, 2018

चलते चलते

बकरीद से पहले अपने मालिक की बेटी को बकरे ने लिखा आखिरी प्रेम-पत्र

21, Aug 2018 By Saquib Salim

मेरी जानेमन,

आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले, दिल की सलामी ले ले

कल तेरी बज़्म से ये दीवाना चला जायेगा, शमा रह जाएगी, परवाना चला जाएगा

मेरी जान, मेरी हूर, हमें मिले अभी वक़्त ही कितना हुआ था ? दो हफ़्ते पहले की ही तो बात है, जब तुम्हारे अब्बा (और मेरे न हो सकने वाले ससुर) मुझे बकरा मंडी से मोलभाव कर के साढ़े तेरह हज़ार रुपये में लाये थे। जब उन्होंने अपने हाथों में मेरी रस्सी पकड़ी तो मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था और मैं मायूस नज़रों से अपनी माँ को देखता हुआ आ रहा था। पर तुम इंसान कहते हो न कि “बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी?” सो वो बेचारी भी कब तक ख़ैर मनाती? और तुम्हारे अब्बा मुझको तुम्हारे घर ले आये।

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फवाद अपने गर्लफ्रेंड के साथ

डरा, सहमा जब मैं इस नये घर में आया तो सबसे पहले मुझे तुम्हारा दीदार हुआ। यक़ीन मानो, मेरी निगाहें तुम पर ठहर गयी। तुम इस नाज़ से चलती हुई मेरी ओर बढ़ रहीं थीं कि यूं महसूस होता था मानो तुम ज़मीन पर क़दम न रख कर कहीं हवाओं में तैर रहीं हो। तुम्हारी काली ज़ुल्फ़ें जब तुम्हारे गोरे गालों पर बलखाती थीं  तो ऐसा लगता था जैसे कि अमावस की रात का मिलन चौदहवी के चाँद से हो रहा हो। धीरे-धीरे तुम मेरे पास आयीं और तुमने मुझे देखते हुए अपने अब्बा से कहा, “पापा आप बकरा ले आये?”

सुनते थे कि दिल टूटने की आवाज़ नहीं होती। तब मैंने ये जान भी लिया।

तुम जैसी नाज़नीन, नाज़अदा, हसीना ने मुझे ‘बकरा’ बोल दिया। जहाँ तक मुझे याद है मेरी माँ ने मेरा भी एक नाम रखा था। माना की तुम अपने अब्बा के सामने मुझे ‘जानू’ नहीं कह सकतीं थी पर मुझे मेरे नाम से तो पुकार सकती थी। क्या बुरा होता अगर तुम अपने अब्बा से पूछती, “अब्बू आप ‘फ़वाद’ को ले आये?” ख़ैर तुमने ये न कहा। खैर, कोई बात नहीं “सितम या करम हुस्न वालों की मर्ज़ी” यही सोच कर कोई शिकवा न किया।

तुमने अपने अब्बा के हाथ से रस्सी अपने हसीन फूल से नाज़ुक हाथों में थाम ली। बस यूं लगा कि  “ये ज़मीं रुक जाये, आसमां थम जाये,  मेरी रस्सी जब तेरे हाथ आये” पर ये ख़ुशी भी कोई ज़्यादा देर टिक ना सकी। तुमने मुझे एक खिड़की की ग्रिल से बाँध दिया और अपनी अम्मां, बहन और दोनों छोटे भाइयों को दिखाने लगीं।

तुमको याद है जान, जब एक दिन तुम्हारे भाई ने मेरा कान खिंचा था तो तुमने उसके दो थप्पड़ लगाए थे। और कैसे तुम अपने हाथों से मुझे हरे पत्ते और चने खिलातीं थी। मेरे बिना तो तुम्हारा दिन ही नहीं कटता था। रोज़ सुबह और शाम तुम मुझे अपने साथ वॉक पर ले कर जाती थी और सारी सहेलियों से मिलवाती थीं, कोई मुझे छू लेती थी तो ऐसे ग़ुस्सा करती थी, जैसे कि तुम मेरी गर्लफ्रैंड न हो कर बीवी हो। कितनी पागल हो तुम, पगली! 

याद है जान कैसे तुम रोज़ रात को सबके सोने के बाद, मेरे पास आ जाया करती थी और मेरे कानों में प्यार से अपने सारे राज़ कह डालती थी। मुझे तुमने ये भी बताया था कि पिछले रमज़ान में तुम चुपके से दिन में पानी पी लिया करती थी और सबको लगता था कि तुम्हारा रोज़ा है।

और ये देखो जो मेरी पीठ पर तुमने अपने हाथों से मेहंदी लगाई है ये अब कितनी रच गयी है।  जानती हो इसका क्या मतलब है? मेरी माँ कहती थी इसका मतलब है कि मेरी गर्लफ्रैंड यानि कि तुम मुझसे बेहद मुहब्बत करती हो।  

चाहता तो मैं यही था कि हम दोनों साथ में एक घर बसाते और हमारे दो छोटे-छोटे मेमने होते, पर इस दुनिया ने आज तक कभी प्यार करने वालों को साथ जीने नहीं दिया। तुमने आज रात जब तुमने मुझसे ये कहा कि कल मुझे तुम्हारे अब्बा मार डालेंगे तो मुझे बहुत डर लगा। पर जब तुमने मुझसे ये रिक्वेस्ट की कि मैं जन्नत में जा कर तुम्हारी सारी दुआएं अल्लाह को खुद बताऊं तो मुझे लगा कि कम से कम मैं अपनी ‘जान’ के किसी काम तो आऊंगा।

कल मैं तुम्हारी मुहब्बत में कट कर मर जाऊंगा। और इस तरह मेरा नाम भी देवदास, रोमियो, मजनू के साथ इश्क़ के शहीदों में शामिल हो जायेगा। बल्कि उनसे कहीं ज़्यादा मैं तो तुम्हारी दुआ अल्लाह तक ले कर जा रहा हूँ!

दिल दिया है जान भी दूंगा, ऐ सनम तेरे लिये।

तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा,

फ़वाद         



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