Monday, 17th December, 2018

चलते चलते

उत्तराखंड की भैंस और बकरियों ने लगाया भेदभाव का आरोप, पूछा- "हम 'राष्ट्रमौसी' क्यों नहीं?"

26, Sep 2018 By gotiya

देहरादून. उत्तराखंड विधानसभा के मान्यवरों ने पिछले बुधवार को सर्वसम्मति से केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा है कि गाय को राष्ट्रमाता घोषित किया जाए। प्रस्ताव में गौमाता के परम पूज्यनीय स्थान के साथ-साथ, उनकी ऑक्सीजन छोड़ने की चमत्कारी क्षमता का भी उल्लेख है जिसे अमरीका के वैज्ञानिकों ने भी मन-मारकर स्वीकार किया है।

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मेरे लिए भी कोई आंदोलन करो

जहाँ एक ओर इससे उत्तराखंड का समस्त गाय समुदाय अचंभित और उत्साहित है, वहीं अप्रत्याशित रूप से उत्तराखंड की भैंसों, बकरीयों और बैलों ने नस्ल-भेदभाव का आरोप लगाकर राज्य सरकार को आड़े हाथों ले लिया है।

उत्तराखंड की भैंस और बकरियों ने मुख्यमंत्री को जो चिट्ठी लिखी है, वह लीक हो गई है-

प्यारे बेटा त्रिवेंद्र!

सदियों से हमारी बहन ‘गाय’ के समकक्ष हमारा भी योगदान रहा है. हमारा भी गोबर उपयोग में लाया जाता है और हमारे दम पर ही कितने इंसानों के घर-परिवार चलते हैं। तो फिर ये भेदभाव क्यों? हम भैंसें काली हैं इसलिए? हम बकरीयाँ छोटी सी हैं इसलिए? हम बैल सीधे-सादे मजदूर हैं इसलिए?

हमारे अंदर से निकलने वाली गैसों पर शोध क्यों नहीं किया गया है? संभव है कि हम ओज़ोन छोड़ते हों और पर्यावरण की रक्षा करते हों! या क्या पता हमारा मूत्र गाड़ियों में महंगे पेट्रोल-डीजल की जगह इस्तेमाल हो सकता हो?

इसलिए हम अपना कड़ा विरोध जताते हुए माँग करते हैं कि भैंसों और बकरियों को ‘राष्ट्रमौसी’ और बैलों को ‘राष्ट्रताऊ’ घोषित किया जाए! अन्यथा हम 2 अक्टूबर से अपनी सेवाएं देना बंद कर देंगे और धरने पर चले जाएंगे!

भैंस-बकरी-बैल उत्थान यूनियन गैरसेण, उत्तराखंड.

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तुरंत आपातकालीन विधान सभा सत्र बुलाकर चर्चा का आह्वान किया है। उसके बाद ही पत्र का उत्तर भेजा जाएगा।

हालांकि सूत्रों की मानें तो अन्य प्रजातियों के यूनियनों में भी विरोध और बराबर हक की सुगबुगाहट हो रही है। अगर कल मुर्गियाँ, मछलियाँ और कुत्ते भी सरकार के विरोध में आ जाते हैं और अपनी सेवाएं बंद कर देते हैं तो सरकार को जनता का आक्रोश झेलना पड़ सकता है और इनके सम्मान के लिए नए नाम सोचने पड़ सकते हैं। फिर कौन कह सकता है कि उसके बाद केंचुए, मधुमक्खियाँ और अन्य जीव भी बराबरी के लिए आंदोलन नहीं करेंगे? कहीं सरकार ने गलत प्राथमिकताओं में फंसकर मुसीबतों का पिटारा तो नहीं खोल दिया?



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