Tuesday, 18th September, 2018

चलते चलते

चाणक्य का देश के नाम पत्र- ‘चुनावी जोड़-तोड़ को चाणक्य नीति कहे जाने से दुखी!'

20, May 2018 By Saquib Salim

प्यारे धरती-वासियों,

वैसे तो मुझे यहाँ स्वर्ग में रहते हुए दो हज़ार वर्ष से भी अधिक का समय हो चुका है और इस दौरान कभी मुझे ऐसा महसूस नहीं हुआ कि मुझे आप धरती के नश्वर मनुष्यों से संपर्क साधने की आवश्यकता है। परन्तु आज मुझे अचानक से ये लगा कि अब समय आ गया है कि मैं आप सब के नाम एक पत्र लिखूं!

Chanakya
धरती वालों को क्रोध में देखते चाणक्य

पिछले कुछ दिनों से मैं बड़ा आहत हूँ. हुआ यूं कि कुछ दिन पहले जब मैं बैठा हुआ एक ग्रंथ का अध्ययन कर रहा था, तभी कहीं से अब्दुल कलाम आ गए, कहने लगे पंडित जी आप भी कहाँ आज तक इन पोथियों में ही खोये हुए हैं, और दुनिया जाने कहाँ से कहाँ पहुँच गयी है! मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा और कहा, ‘क्यों भाई कहाँ पहुँच गयी? मुझे तो लगता था कि वहीं की वहीं है, सूर्य के इर्द गिर्द घूम रही है!” यह सुनकर कलाम हँस पड़ा और बोला, “पंडित जी मैं समाज की बात कर रहा हूँ, ये लीजिये आपके लिए टी.वी ले कर आया हूँ. इसको देखिये और जानिये दुनिया कहाँ से कहाँ जा चुकी है!” ये कहते हुए कलाम मुझको रिमोट थमा गए।

बस जिस क्षण से मैंने इस यंत्र का प्रयोग शुरू किया मेरा तो सुख चैन ही छिन गया है। और पिछले तीन-चार दिनों से तो ये हाल है कि मैं एक मिनट सो नहीं पा रहा हूँ! वैसे तो इस यंत्र पर जो समाचार दिखाए जाते हैं, उनको देख कर दुःख से अधिक हँसी आती है, परन्तु पिछले चार दिन से जो कुछ इन चैनलों पर चल रहा है वो मुझे व्यक्तिगत रूप से आहत कर रहा है!”

भारतवर्ष के कर्नाटक प्रदेश में राजनीतिक दल चुनाव के बाद दूसरे के सदस्यों को रिश्वत के द्वारा, डरा धमका कर न जाने कैसे-कैसे अपने दल में मिलाना चाहते हैं, उन्हें इस बात की ज़रा भी फ़िक्र नहीं है कि जनादेश क्या है, और प्रजातंत्र क्या होता है? खैर ये तो उनकी आपस की बात है. मुझे दुःख इस बात का है कि ये टी.वी वाले इस छल-कपट को, इस चोरी को, इस गुंडागर्दी को ‘चाणक्य नीति’ की संज्ञा दे रहे हैं. क्या मैं आपको चोर उचक्का या कपटी दिखाई देता हूँ?

“जब से यह समाचार देखा है, बहुत दुखी हूँ! कल रात खाने पर सोक्रेटस, प्लेटो, एरिस्टोटल, आर्यभट, भास्कराचार्य, अल-बेरुनी आदि से मिला तो मैं पूछ बैठा, “महानुभावों क्या आप में से किसी को लगता है कि मैं ने अपने जीवन में चोरी की या मैं कपटी था?” अल-बेरुनी बोले, “पंडित जी आप भी शायद टी.वी देखने लगे! अरे आज कल के नेताओं ने तो मुझको भी विद्वान से घटाकर एक मुस्लिम आक्रमणकारी बना दिया है! आप इन पर ध्यान न दीजिये!” यही मत बाक़ी विद्वानों का भी था। मैंने उनकी बात मानी और घर आ कर सो गया।

“सुबह फिर टी.वी खोला तो वहाँ फिर ‘चाणक्य नीति’ के बखान हो रहे थे! मैं व्यथित हो गया, सैर के लिए निकला तो गाँधी से भेंट हो गयी, मैंने पूछा, “गाँधी, ये तुमने कैसा लोकतंत्र बनवा दिया है? जहाँ चोरी को चाणक्य नीति कहा जा रहा है!” उसने जवाब दिया, “पंडित जी, क्षमा चाहूँगा परन्तु ये मेरा काम नहीं है! मैं तो केवल अंग्रेजों को भगाने तक वहां था! फिर गोडसे ने मेरी हत्या  कर दी, मुझे आपकी सेवा में भेज दिया! ये लोकतंत्र तो अम्बेडकर और नेहरु ने बनाया है, उनसे ही पूछिये!”

आगे चल कर अम्बेडकर और नेहरु साथ में एक पेड़ के नीचे लूडो खेलते हुए मिल गए। मुझसे रहा न गया।. मैंने कहा “ये तुम लोगों ने भारत में कैसा लोकतंत्र बनाया है?” अम्बेडकर बोला, “जी क्या हुआ पंडित जी” मैंने गुस्से में कहा, “ये लोग चोरी को ‘चाणक्य नीति’ की संज्ञा दे रहे हैं! यही लिखा था तुमने अपने संविधान में?” अम्बेडकर ने जवाब दिया, “पंडित जी, मैंने ऐसा कुछ नहीं लिखा था, ये सब राजनीती तो नेहरु जी का काम था, इनका ही किया धरा है सब!” ये सुन नेहरु ने तपाक से कहा, “पंडित जी अम्बेडकर जी की बात सही नहीं है! ये जो अभी ‘चाणक्य नीति’ के नाम पर चोरी कर रहे हैं ये मेरे नहीं गोलवलकर जी के शिष्य हैं. उनसे कहिये!”

“वहीं बगल में गोलवलकर अपनी शाखा लगा रहा था! मैंने आवाज़ लगायी तो दौड़ता आया और बोला, “क्या हुआ पंडित जी बड़े क्रोधित हैं?” मैंने कहा, “ये क्या लगा रखा है तुम्हारे शिष्यों ने धरती पर? चोरी और गुंडागर्दी को ‘चाणक्य नीति’ की संज्ञा दी जा रही है!” गोलवलकर ने जवाब दिया, “पंडित जी मैं क्या करूँ, ये लोग मेरा नाम लेते ज़रूर हैं, पर जैसे आपके नाम पर गुंडागर्दी करते हैं, मेरा नाम ले कर तो ये खुले आम दंगे करते हैं!”

“ये सब सुन मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया, क्या सच में धरती का समाज इतना नीच हो गया है कि चोरी, डकैती, गुंडागर्दी, छल, हत्या आदि को देश के स्वर्गीय पुरुषों की धरोहर बताता है? मेरी आपसे बस इतनी विनती है कि आप को अपने देश को जैसे बर्बाद करना है आप कीजिये कृपा कर के हम लोगों के सर ये इल्जाम न डालिए!”

आपका,

बिन्दुसार



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