Saturday, 17th November, 2018

चलते चलते

"तीन लाख तक कमाने वाले रहते हैं सबसे ज़्यादा डिप्रेशन में!" यह सुनकर पैरेंट्स ने अपने Techie बेटे को लगाया फ़ोन

08, Aug 2018 By Ritesh Sinha

भोपाल. सुबह-सुबह तेज़ी से अख़बार पर सरसरी निगाह डालते हुए चेतन लाल गुप्ता जी एक ख़बर पर आकर ठहर गए। ख़बर थी कि जो लोग साल में तीन लाख रुपये तक कमाते हैं, वे सबसे ज़्यादा डिप्रेशन में रहते हैं। यह खबर ‘दिल्ली फार्मास्यूटिकल साइंस रिसर्च यूनिवर्सिटी’ के एक सर्वे पर आधारित थी, जिसने गुप्ता जी को सोचने पर मजबूर कर दिया। उनका बेटा भी गुरुग्राम में एक टेक कंपनी में काम करता है, और उसका वेतन भी इसी के आसपास भटकता रहता है। “तीन लाख वाले डिप्रेशन में चले जाते हैं तो दस लाख वाले तो सीधे पागल ही हो जाते होंगे!” -गुप्ता जी एकदम उल्टा अर्थ निकालकर बड़बड़ाने लगे।

IT employee
कोड लिखते हुए अपने पापा से बात करता जोगनाथ

जब उनसे रहा नहीं गया तो उन्होंने अपने बेटे जोगनाथ को फोन लगा दिया। जैसे ही उसने फोन उठाया गुप्ता जी फूट पड़े “बेटा! तूझे किस टाइप के सपने आते हैं?” यह सुनकर जोगनाथ ने गुस्से में कहा- “ये कैसा बेहूदा सवाल है! कौन हो बे?”

“मैं तुम्हारा बाप बोल रहा हूँ! सवाल का जवाब दो!” -गुप्ता जी इधर से बोले। “ओह्ह सॉरी पापा! मैं देख नहीं पाया! लेकिन ये कैसा सवाल है?”

“आग या पानी को देखकर कुछ करने का मन करता है क्या? उंचाई से कूदने का मन करता है क्या? किसी को जी भरकर कूटने का मन करता है क्या? हँसता भी है या नहीं? ये जानना चाहता हूँ मैं! कहीं तू डिप्रेशन में तो नहीं चला गया?” -गुप्ता जी ने एक सांस में कहा।

जोगनाथ का दिमाग खराब हो गया “अच्छा अभी फोन रक्खो! अभी मैं ‘कोड’ लिख रहा हूँ, आज पूरा नहीं किया तो बॉस डिप्रेशन में चला जाएगा!” -कहते हुए जोगनाथ ने फोन काट दिया।

इस बारे हमने रिसर्च करने वालों से भी बातचीत की। डिप्रेशन की सीमा से ज्यादा वेतन पाने वाले यूनिवर्सिटी के निदेशक ने खुलासा किया कि “हमने कोई सर्वे-फर्वे नहीं किया है! जो मन में आया वो लिखकर छाप दिया! वैसे भी, इसमें सर्वे करने की क्या जरूरत है, जो कम वेतन पाता है वो तो डिप्रेशन में रहेगा ही ना!”



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